
Savita Singh explores themes of love and suffering through a dreamlike narrative.
अपनी यातना में । सविता सिंह वह सो चुकी थी कई नींदें कई दिन और रातें बीत चुकी थीं कई ज़िंदगियाँ बन और बिखर चुकी थीं इस बीच लेकिन एक सपना था जो अब भी झिलमिला रहा था जिसकी झालर को पकड़ वह उठी थी और उन फूलों को ढूँढ़ने लगी थी जिन्हें सीने से लगा वह सोने गई थी जागने पर यह संसार उसे अब भी बहुत जाना-पहचाना ही लगा था फूल भले अनुपस्थित थे लेकिन उसके प्रेमी वहाँ खड़े थे बाँहें फैलाए हर हाल में प्रेम बचा रहता है उसने सोचा था फिर आह्लादित हो ख़ुद से कहा था आसमान को छत और धरती को बिस्तर बना समुद्र की तरह कोई गीत गाना चाहिए तभी उसका एक प्रेमी उसे बालों से पकड़ खींचता हुआ ले गया नींद और सपनों से बाहर समेटे हुए अपने सीने में चुराए उसके सारे फूल जहाँ सब कुछ नया था अपनी यातना में
Guest: Savita Singh
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