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Ichhayein | Asteek Vajpeyi
Jun 25, 2026
1m 14s
Zindagi Jab Bhi Teri Bazm Mein | Shahryar
Jun 24, 2026
2m 00s
Milan | Bharat Bhushan Aggarwal
Jun 23, 2026
1m 33s
Diya | Om Prakash Valmiki
Jun 22, 2026
1m 55s
Mobile | Manglesh Dabral
Jun 21, 2026
2m 52s
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| Date | Episode | Topics | Guests | Brands | Places | Keywords | Sponsor | Length | |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| 6/25/26 | ![]() Ichhayein | Asteek Vajpeyi | इच्छाएँ । आस्तीक वाजपेयीलकड़ी की अलमारी पर धूल,उनसे चिपकी दीवार पर टँगी इच्छाएँ।जैसे मैं अलमारी को,वैसे पूरी न हुई इच्छाएँ मुझे,झाड़ने आती हैं। | 1m 14s | ||||||
| 6/24/26 | ![]() Zindagi Jab Bhi Teri Bazm Mein | Shahryar | ज़िंदगी जब भी तिरी बज़्म में लाती है हमें । शहरयारज़िंदगी जब भी तिरी बज़्म में लाती है हमेंये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमेंसुर्ख़ फूलों से महक उठती हैं दिल की राहेंदिन ढले यूँ तिरी आवाज़ बुलाती है हमेंयाद तेरी कभी दस्तक कभी सरगोशी सेरात के पिछले-पहर रोज़ जगाती है हमेंहर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यूँ हैअब तो हर वक़्त यही बात सताती है हमें | 2m 00s | ||||||
| 6/23/26 | ![]() Milan | Bharat Bhushan Aggarwal | मिलन । भारतभूषण अग्रवालछलक कर आई न पलकों पर विगत पहचान,मुस्कुरा पाया न ओठों पर प्रणय का गान;ज्यों जुड़ीं आँखें, मुड़ीं तुम, चल पड़ा मैं मूक -इस मिलन से और भी पीड़ित हुए ये प्राण। | 1m 33s | ||||||
| 6/22/26 | ![]() Diya | Om Prakash Valmiki | दिया । ओमप्रकाश वाल्मीकि कच्चे घर मेंजलते दीए की रोशनी परक़ब्ज़ा करके बैठ गए हो तुम।लौ के ठीक ऊपर काला धुआँ है।जो पर्त दर-पर्तकालिख पोत रहा हैदीवार पर,नीचे गहरा अँधेरा हैजिसमें दीपदान को पकड़े रहा हूँ मैंहज़ार-हज़ार वर्षों से अनवरत।मेरी पिंडलियोंऔर भुजाओं के माँस से बनी हैं बातीहड्डियों को निचोड़करनिकाला गया है तेल।अँधेरे में,कालिख पुता मेरा जिस्मजिसे तुमने अपवित्रघोषित कर दियातिल-तिल जल रहा हैतुम्हें रोशनी देने के लिए।किंतु इतना याद रखोजिस रोज़ इंकार कर दियादीया बनने सेमेरे जिस्म नेअँधेरे में खो जाओगेहमेशा-हमेशा के लिए। | 1m 55s | ||||||
| 6/21/26 | ![]() Mobile | Manglesh Dabral | मोबाइल । मंगलेश डबरालवे गले में सोने की मोटी जंज़ीर पहनते हैंकमर में चौड़ी बेल्ट लगाते हैंऔर मोबाइलों पर बात करते हैंवे एक आधे अँधेरे और आधे उजले रेस्तराँ में घुसते हैंऔर खाने और पीने का ऑर्डर देते हैंवे आपस में जाम टकराते हैंऔर मोबाइलों पर बात करते हैंउनके मोबाइलों का रंग काला है या आबनूसीचाँदी जैसा या रहस्यमय नीलाउनके आकार पतले छरहरे या सुडौल आकर्षकवे अपने नए मोबाइलों को अपनी नई प्रेमिकाओं की तरह देखते हैंऔर उन पर बात करते हैंवे एक-दूसरे के मोबाइल हाथ में लेकर खेलते हैंऔर उनकी विशेषताओं का वर्णन करते हैंवे एक अँधेरे-उजले रेस्तराँ में घुसते हैंऔर ज़्यादा खाने और ज़्यादा पीने का ऑर्डर देते हैंवे धरती का एक टुकड़ा ख़रीदने का ऑर्डर देते हैंवे जंगल पहाड़ नदी पेड़और उनमें दबे खनिज को ख़रीदने का ऑर्डर देते हैंऔर मोबाइलों पर बात करते हैंवे पता करते रहते हैंकहाँ कितना खा और पी सकते हैंकहाँ कितनी संपत्ति बना सकते हैंवे पता करते रहते हैंधरती कहाँ पर सस्ती है खाना-पीना कहाँ पर महँगा हैवे फिर से एक अँधेरे-उजले रेस्तराँ में बैठते हैंऔर सस्ती धरती और महँगे खाने-पीने का ऑर्डर देते हैंऔर मोबाइलों पर बात करते हैंवे फिर से अपनी जंज़ीरें ठीक करते हैं बेल्ट कसते हैंवे अपने मोबाइलों को अपने हथियारों की तरह उठाते हैंऔर फिर से कुछ ख़रीदने का आर्डर देने चल देते हैं। | 2m 52s | ||||||
| 6/20/26 | ![]() Ve Kaise Din The | Kirti Chowdhary | वे कैसे दिन थे। कीर्ति चौधरीवे कैसे दिन थेजब चीज़ें भागती थींऔर हम स्थिर थेजैसे ट्रेन के एक डिब्बे में बंद झाँकते हुएओझल होते थे दृश्यपल के पल में—...कौन थी यह तार पर बैठी हुईबुलबुल, गौरय्या या नीलकंठ?आसमान को छूता हुआसवन का जोड़ा था?दूरी पर झिलमिल-झिलमिल करतीनदिया थी?या रेती का भ्रम?कभी कम कभी ज़्यादाप्रश्न ही प्रश्न उठते थेहम विमूढ़ ठगे-सेसुलझाते ही रहतेऔर चीज़ें हो जाती थीं ओझलवे कैसे दिन थेजो रहे नहीं।सीख ली हमने चाल समय कीभागने लगे सरपटबदल गए सारे दृश्यशाखों पर दुबकी भूरी चिड़ियों नेकुतूहल से देखा हमेंहवा ने बढ़ाई बाँहरसभीनी गंधमयीलेकिन हम रुके नहींहमने सुनी ही नहींझरनों की कलकलताड़ पत्रों की बाँसुरीपोखर में खिले रहे दल के दल कमलऔर मुरझाए-से हमआगे और आगेभागते ही रहेछोड़ते चले ही गएजो कुछ पा सकते थेहाथ रही केवलयही अंतहीन दौड़और छूटते दिनों के संगपीछे सब छूट गया। | 2m 21s | ||||||
| 6/19/26 | ![]() Hey Meri Uttara | Ashutosh Sharma | हे मेरी उत्तरा! । आशुतोष शर्मामेरे शस्त्र की धारमयी रति कोतुम्हारी भाषा के वैराग्य ने छीन लिया थाहे मेरी उत्तरा!मेरे रण में जाने से पूर्वतुम्हारे ऑँचल का सतीत्वमुझे आगाह कर रहा थाएक भयंकर सामूहिक पाप के प्रतिमेरे मातुल की वंशी सेएक मौन भाप की ध्वनि आ रही थीगांडीव अपने चरण मुझसे दूर हटा रहा थाआधा सा लग रहा था पिता भीम का आश्वासनहै मेरी उत्तरा!तुम्हारे बाल वैधव्यता सेकुरुक्षेत्र के मंडप में होगा मेरा विवाहमैं यह जानता था किधर्मक्षेत्र मेरी शोणित के योगदान का आकांक्षी है।इतिहास मेरी वीरता का आनन्द लेना चाहता है।हे मेरी उत्तरा!हमारे प्रेम का साहित्यछंदबद्ध नहीं हैअसंकलित, अज्ञात कहींमेरे मस्तक की भांतिजयद्रथ के पैरों तलेया सेनापतियों के विजयी रथों के नीचेसिपाहियों के शर्वों साइतिहासहीन पड़ा हैगौरव करने वाली जातिर्यों का सचकलम का सौदा करने वाले घातियों ने खा लिया हैहे मेरी उत्तरा!चक्रवर्तियों की सभा मेंपासों से तुम्हारी नियति को न खेल जाए कोई राजवंशतुम्हारा दाव पर लग जानामेरे पौरुष पर घाव सा न लग जाएइसी चिन्ता का नाम महाभारत है।हे मेरी उत्तरा!अपने ललाट का सिन्दूरमेरे भीगे पीताम्बर से पोंछनासंभवतः तुम्हारी माँग की अरुणिमा में और वृदधि हो जायव मेरा बलिदान कहीं और गौरवशालीऔर पुकारूं मैं तुम्हेंनिर्जीव पड़े श्रृंगारों सेहे मेरी संगिनी!हे मेरी अर्धागिनी!हे मेरी वीरांगना!हे मेरी उत्तरा!हे मेरी उत्तरा!हे मेरी उत्तरा! | 3m 48s | ||||||
| 6/18/26 | ![]() Ladna | Pawan Karan | लड़ना। पवन करणमुझे उन सबकी ख़ूब याद आती हैजिन्होंने मुझसे कई बार कहाकि मुझे लड़ना चाहिएमैं उन सबको कभी भूल नहीं पाताजो मुझसे हमेशा कहते रहे कि मुझेलड़ने से डरना नहीं चाहिएमैं उनसे माफ़ी माँगना चाहता हूँजिन्होंने मुझसे कहा कि मैं हीनहीं लड़ूँगा तो फिर कौन लड़ेगामैंने उनकी मानी होतीतो मैं भी लड़कर हारा होता | 1m 51s | ||||||
| 6/17/26 | ![]() Pahadi Baccha | Nirmala Putul | पहाड़ी बच्चा । निर्मला पुतुल पहाड़ की गोद में पहाड़ के छोटे-छोटे टुकड़ों साखेलता है पहाड़ी बच्चा लड़खड़ाते कदमों से पहाड़ चढ़ते रोपता है पहाड़ी धरती पर पाँव पहाड़ी माहौल में पहाड़ की तरह पूरी ताकत से होने के लिए पहाड़ी बच्चों के भीतर होता है पूरा का पूरा पहाड़,और पहाड़ों की गोद में होता है दौड़ता, भागता पहाड़ी बच्चा,पहाड़ी बच्चा देखता है पहाड़ के ऊपर से गुज़रता जहाज़ और पूछता है पिता सेउस नए पक्षी के बारे में उस नए पक्षी के बारे में उस नए पक्षी के बारे में। | 1m 53s | ||||||
| 6/16/26 | ![]() Chupke Se Idhar Aa Jao | Shahryar | चुपके से इधर आ जाओ । शहरयारदरवाज़ा-ए-जाँ से हो करचुपके से इधर आ जाओइस बर्फ़ भरी बोरी कोपीछे की तरफ़ सरकाओहर घाव पे बोसे छिड़कोहर ज़ख़्म को तुम सहलाओमैं तारों की इस शब कोतक़्सीम करूँ यूँ सब कोजागीर हो जैसे मेरीये अर्ज़ न तुम ठुकराओचुपके से इधर आ जाओ | 1m 27s | ||||||
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| 6/15/26 | ![]() Ibn-e-Insha | Swanand Kirkire | इब्ने इंशा । स्वानंद किरकिरेहम इंशा जी के चेले हैंहम जोगी हैं बैरागी हैंहम प्रीत प्रेम के प्यासे हैंहम फ़ितरत से अनुरागी हैंइंशा की लय पर लिखते हैंकुछ उनकी तरह ही दिखते हैंइंशा की तरह हम प्रेमी हैंइंशा की तरह हम बाग़ी हैंहै चाँद से अपना यारानाहै मन उसका आना-जानाजिस शै से हमारा दिल है लगावो चाँद-चाँद कहलाती हैहज़ारों रातें चाँद हज़ारहर शब है मोहब्बत का बाज़ारहम जीते हैं अजी ऐसे हीहमें चाँद लगन जो लागी हैइस शब का चाँद तो आधा हैइसे कम कह दें या ज़्यादा हैइस चाँद के आगे पूनम है?या आगे इसके अमासी है?हम अंधी शब में जी लेंगेहम मन में चाँद दरस लेंगेहम इंशा जी के चेले हैंहमें कविता गढ़नी आती हैइंशा जी, कविता जीवन है?या जीवन कविता है, कह दोये जो भी है इसे जी लो जी...जिसे जैसी समझ में आती हैबड़ा ध्यान लगा कर हमने सुनोजीवन की कविता बाँची हैअपने घर नौ मन तेल है जीअपने दर राधा नाची है। | 2m 24s | ||||||
| 6/14/26 | ![]() Shareef Log | Abdul Bismillah | शरीफ़ लोग । अब्दुल बिस्मिल्लाहपत्थर के कोयले सेजो धुआँ उठता हैउसमें एक शहर महकता हैसुना है उस शहर मेंशरीफ़ लोग रहते हैंलेकिनशराफ़त काधुएँ से क्या नाता हैयह समझ में नहीं आताजैसे यहकि हर बार जंगल का राजाशेर ही क्यों हो जाता हैया यहकि बच्चों की फ़सलमुरझाने क्यों लगी हैकि बिना किसी बीमारी केमेरा जिस्मतलवार क्यों हो रहा हैक्या यह बातशरीफ़ों के कर्त्तव्य से बाहर हैकि वे धुएँ को ख़त्म करेंअथवापत्थर को जलने से रोकेंमैं समझता हूँइतना ही नहींजंगल का राज्यबच्चों की फ़सलमेरा जिस्मसबके प्रति उनकी ज़िम्मेदारी हैअगर शहर मेंसचमुच शरीफ़ लोग रहते हैं। | 1m 53s | ||||||
| 6/13/26 | ![]() Hatheli Ki Lakeerein | Madhav Kaushik✨ | poetryphilosophy+3 | माधव कौशिक | — | — | हथेलीलकीरें+5 | — | 2m 01s | |
| 6/12/26 | ![]() Usne Kaha | Shiv Kumar Gandhi✨ | city liferelationships+3 | शिव कुमार गांधी | — | — | cityevening+3 | — | 2m 34s | |
| 6/11/26 | ![]() Is Ghat-Antar Baag-Bageeche | Kabir✨ | Kabirpoetry+3 | — | — | — | Kabirpoetry+3 | — | 1m 51s | |
| 6/10/26 | ![]() Kya Kiya | Sushma Kumari✨ | life struggleshope+3 | Sushma Kumari | मुक्तिबोध | — | lifestruggles+5 | — | 2m 04s | |
| 6/9/26 | ![]() Be-Awaaz | Veeru Sonkar✨ | languagesilence+3 | वीरू सोनकर | — | — | silencelanguage+3 | — | 1m 19s | |
| 6/8/26 | ![]() Meri Ma Ek Patang Hai | Kumar Divyanshu Shekhar✨ | motherhoodmetaphor+3 | कुमार दिव्यांशु शेखर | Meri Ma Ek Patang Hai | — | motherkite+4 | — | 1m 45s | |
| 6/7/26 | ![]() Harmony | Hemant Deolekar✨ | harmonymusic+3 | हेमंत देवलेकर | — | — | harmonymusic+3 | — | 1m 32s | |
| 6/6/26 | ![]() Ummeed | Shailay✨ | hopedreams+3 | — | — | — | hopedreams+3 | — | 1m 41s | |
| 6/5/26 | ![]() Ek Abhineta Ki Thakaan | Agney✨ | theateracting+3 | — | — | — | actortheater fatigue+3 | — | 1m 36s | |
| 6/4/26 | ![]() Yah Number Maujood Nahi Hai | Manglesh Dabral✨ | identitychange+3 | मंगलेश डबराल | — | — | मंगलेश डबरालनंबर+5 | — | 2m 56s | |
| 6/3/26 | ![]() Tum Ho | Nazim Hikmat | तुम हो । नाज़िम हिकमतअनुवाद : सुरेश सलिलतुम्हीं मेरी ग़ुलामी हो, तुम्हीं मेरी आज़ादीगर्मियों की किसी बेलिबास रात की तरह मेरा जिस्ममेरा वतन हो तुमपन्ने जैसी हल्की हरी आँखें,हैरतअंगेज़ हो तुम, ख़ूबसूरत और ज़िंदादिलमेरी हस्रत हो तुम, मेरी पहुँच से परे हरदम। | 1m 45s | ||||||
| 6/2/26 | ![]() Sankatgrasth | Vivek Nirala | संकटग्रस्त। विवेक निराला भूमंडलीकरण के इस युग में संकट ही संकट थे स्थानीय लोग कुछ वैश्विक संकटों से जूझ रहे थे और वैश्विक लोग स्थानीय संकटों से।मेरा संकट मेरी टूटी खाट थी जब कि मैं स्वप्न में था। किसानों के पास कर्ज था और उद्योगपतियों के पास मर्ज सरकार को किसी से हर्ज न था।खुदगर्ज सिर्फ़ हिन्दी का कवि था लेकिन वह भी संकट से दुबराया था।न उसकी किताब बिकती थी और न उसकी आत्मा। उसके शरीर में जन्म से एक ही गुर्दा था वह उसे भी नहीं बेच सकता था बस इसीलिए मुर्दा था। | 1m 51s | ||||||
| 6/1/26 | ![]() Ped | Omprakash Valmiki✨ | naturepoetry+3 | — | — | — | treeleaves+5 | — | 1m 29s | |
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