
Sushma Kumari reflects on her life experiences and struggles through poetry.
क्या किया। सुषमा कुमारी घोर अँधेरे में जब 'मुक्तिबोध' के शब्द गूंजते हैं कानों में - 'कहो इस जीवन में क्या किया? किसी मेमने की तरह घबराई, मैं भागने लगती हूँ उल्टी दिशा में! बहुत-बहुत भाग कर फिर पहुँचती हूँ वहीं! न बचने की हालत में बहुत-बहुत सोचती हूँ, और पाती हूँ। अँधेरी खदानों में खोदती रही जीवन। उम्मीदों की अनाज से, भरती रही बच्चों का पेट! मजदूरी की झुकी हुई पीठ पर बोझा उठाया। कतरनों को चुन कर गढ़े बहुत-बहत सपनें। बहुत-बहुत लड़ी बहुत-बहुत दुःखों के बीच खड़ी रही पलाश की तरह! जहाँ-जहाँ मुरझा जाना था मुझे वहीं-वहीं तो खिली! खाली हाँथो में सहेजे रखा हमेशा अपने पूर्वजों की मुट्ठी भर जिजीविषा!
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