
The episode explores the metaphor of a mother as a kite, reflecting on her struggles and existence.
मेरी माँ एक पतंग है । कुमार दिव्यांशगु शेखर पतंग बने। नियत हुआ आकाश; पर किसी तौर उन्हें भाते रहे तार, पटरियों के ऊपर बिछे समानांतर। ओ मेरी मातः! तुम एक पतंग हो, तुमने नहीं चुना आकाश। कितना त्रासद है यह तार से चिपका-उलझा-फड़फड़ाता निरंतर सुलगता एक दिन गल जाएगा तुम्हारा अस्तित्व।
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