Mere Naseeb ka Likha | Shayar Jamali

Mere Naseeb ka Likha | Shayar Jamali

From Pratidin Ek Kavita by Nayi Dhara Radio

April 24, 2026 · 2 min · Episode 1120

About this episode

The episode features poet Jamali discussing themes of fate and relationships through his poetry.

मिरे नसीब का लिक्खा बदल भी सकता था । शायर जमाली मेरे नसीब का लिक्खा बदल भी सकता था वो चाहता तो मेरे साथ चल भी सकता था ये तू ने ठीक किया अपना हाथ खींच लिया मेरे लबों से तिरा हाथ जल भी सकता था उड़ाती रहती है दुनिया ग़लत-सलत बातें वो संग-दिल* था तो इक दिन पिघल भी सकता था संग-दिल: पत्थर दिल उतर गया तिरा ग़म रूह की फ़ज़ाओं में रगों में होता तो आँखों से ढल भी सकता था मैं ठीक वक़्त पे ख़ामोश हो गया वर्ना मिरे रफ़ीक़ों* का लहज़ा बदल भी सकता था रफ़ीक़: साथ रहने वाले अना को धूप में रहना पसंद था वर्ना तेरे ग़ुरूर का सूरज तो ढल भी सकता था रगड़ सकी न मिरी प्यास एड़ियाँ वर्ना हर एक ज़र्रे से चश्मा* उबल भी सकता था चश्मा: झरना पसंद आई न टूटी हुई फ़सील की राह मैं शहर-ए-तन* की घुटन से निकल भी सकता था शहर-ए-तन: बदन वो लम्हा जिस ने मुझे रेज़ा-रेज़ा* कर डाला किसी के बस में जो होता तो टल भी सकता था रेज़ा-रेज़ा: टुकड़े-टुकड़े

People in this episode

Guest: शायर जमाली

Topics covered

  • poetry
  • fate
  • love
  • relationships
  • emotions

Keywords

  • नसीब
  • शायरी
  • जमाली
  • ग़म
  • रफ़ीक़
  • चश्मा
  • शहर-ए-तन
  • रेज़ा-रेज़ा

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